Tuesday, 20 September 2011

गुणकारी है सहजन : योगाचार्य विजय श्रीवास्तव




सहजन एक ऐसा वृक्ष है जो सम्पूर्ण भारत में पाया जाता है,यह ग्रीष्म ऋतु के प्रारंभिक काल  में फली के रूप में फल देना प्रारंभ कर देता है जिसका प्रयोग आमतौर पर सब्जी के रूप में किया जाता है, कुछ लोग इसकी फली को दाल में डालकर पकाकर भी सेवन करतें हैं | सहजन  विभिन्न  औषधीय गुणों के साथ आयरन  का अदभुत भण्डार भी है| विभिन्न क्षेत्रों व प्रान्तों में यह विभिन्न नामों से जाना जाता है,जैसे सहजन , सजिना, सुरजन, सोभाजन, सुलजना,मुआ, मुगा चेझाड़,मरुगाई,इंडियन हार्स रेडिश, विद्रधि नाशन आदि| इसके वृक्ष के विभिन्न अंगों को  अलग-अलग रोगों के लिए उपयोग में लाया जाता है,जैसे इसके फूल उदर रोगों व कफ रोगों में, इसकी फली वात व उदरशूल में, पत्ती नेत्ररोग, मोच, शियाटिका,गठिया आदि|
जड़  दमा, जलोधर, पथरी,प्लीहा रोग आदि के लिए उपयोगी है तथा छाल का उपयोग शियाटिका ,गठिया, यकृत,विव्दधि आदि रोगों के लिए श्रेयष्कर है| सहजन के विभिन्न अंगों के रस को मधुर,वातघ्न,रुचिकारक, वेदनाशक,पाचक आदि गुणों के रूप में जाना जाता है| सहजन के छाल में शहद मिलाकर पीने से वात, व कफ रोग शांत हो जाते है| इसकी पत्ती का काढ़ा बनाकर पीने से गठिया,,शियाटिका ,पक्षाघात,वायु  विकार में शीघ्र लाभ पहुंचाता है| शियाटिका   के तीव्र वेग में इसकी जड़ का काढ़ा तीव्र गति से चमत्कारी प्रभाव दिखता है, मोच इत्यादि आने पर सहजन की पत्ती की लुगदी बनाकर सरसों तेल डालकर आंच पर पकाएं तथा मोच के स्थान पर लगाने से शीघ्र ही लाभ मिलने लगता है | सहजन को अस्सी प्रकार के दर्द व बहत्तर प्रकार के वायु विकारों का शमन  करने वाला बताया गया है| 

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